
गजेन्द्र ठाकुर
माटिक खेलौना-गाड़ी
(शूद्रक रचित संस्कृत नाटक मृच्छकटिकम् केर मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर)
पात्र-परिचय
चारुदत्त: एकटा ब्राह्मण व्यापारी
रोहसेन: हुनकर पुत्र
मैत्रेय: हुनकर मित्र
वर्धमानक: हुनकर घरक नौकर
संस्थानक: राजा पालकक साढ़ू
स्थावरक: हुनकर नौकर
संस्थानकक आन नौकर
एकटा विट (राजदरबारी)
आर्यक: एकटा अहीर (ग्वाला) जे बाद मे राजा बनि जाइत अछि
शर्विलक: एकटा ब्राह्मण, मदनिकासँ प्रेम करय वाला
एकटा संवाहक (मालिश करय वाला): जे बाद मे बौद्ध भिक्षु बनि जाइत अछि
माथुर: जुआघरक मालिक
दर्दुरक: एकटा जुआड़ी
आन जुआड़ी
कर्णपूरक आ कुम्भीलक: वसन्तसेनाक नौकर
वीरक आ चन्दनक: आरक्षी (पुलिस)
गोह आ अहीन्त: जल्लाद
वसन्तसेनाक घरक नौकर सभ
एकटा न्यायाधीश, एकटा श्रेष्ठि (नगर सेठ), एकटा कायस्थ (लिपिक) आ एकटा चोबदार
वसन्तसेना: एकटा गणिका (नगरवधू)
हुनकर माय
मदनिका: वसन्तसेनाक दासी
वसन्तसेनाक एकटा आन दासी
चारुदत्तक पत्नी
रदनिका: चारुदत्तक घरक दासी
दृश्य: उज्जयिनी (जेकरा अवन्ती सेहो कहल जाइत अछि) आ ओकर आसपासक क्षेत्र ।
प्रथम अङ्क
दर्शक सभक लेल मङ्गलाचरण:
हुनकर मुड़ल ठेहुनकें साँपक दोहड़ायल फेरसँ बनल जटा-गेंठ जकड़ने अछि; अपन श्वास रोकलासँ हुनकर ज्ञानेन्द्रिय सभ एहन शिथिल भ’ गेल छनि जेना चेतना मृत्युक गम्भीरता मे डूमि गेल हो; ओ अपन भीतर, सत्यक आँखिसँ, समस्त क्रियाकलापसँ मुक्त परमात्माकें देखैत छथि। ओही शिवक ध्यान अहाँक रक्षा करय; ओ संसारक शून्यत्ताकें पूरक रूप मे जनैत परम तत्त्वक चिन्तन करैत छथि।
आ पुनः:
शिवक कण्ठ अहाँक सभ विपत्तिसँ रक्षा करय, जे एकटा डराओन मेघक समान बुझाइत अछि, जकरा पर बिजुरीक चमक सन गौरीक बांहि सुशोभित अछि।
सूत्रधार: अहाँ सभकें रसभङ्ग करय वाला एही कठीन आ थकावय वाला काजसँ बस! आब हम परम श्रद्धाक संग आदरणीय महापुरुष सभकें प्रणाम करैत छी, आ घोषणा करैत छी जे हम "मृच्छकटिकम्" (माटिक खेलौना-गाड़ी) नामक नाटक प्रस्तुत करबाक इच्छा राखैत छी ।
एकर लेखक एकटा एहन पुरुष छलाह: जे हाथीक समान गौरवमय चालि मे प्रतिस्पर्धा करैत छलाह; हुनकर आँखि चकोर पक्षीक समान छल जे चन्द्रमाक किरणक रसास्वादन करैत अछि; हुनकर मुख पूर्ण चन्द्र सन दीप्तिमान छल; हुनकर स्वरूप अत्यंत प्रिय छल, एहन सभकेँ ज्ञात अछि । द्विज सभ मे श्रेष्ठ ई कवि पृथ्वी पर ‘शूद्रक’ नामसँ विख्यात छलाह, हुनकर गुणक गम्भीरता अगाध आ अद्वितीय छल ।
आ पुनः: ओ सामवेद, ऋग्वेद आ गणित शास्त्रक ज्ञाता छलाह; ओ गणिका सभक कला आ हाथी सभक विज्ञान सेहो नीक जकाँ जनैत छलाह। शिवक कृपासँ हुनकर आँखि कहियो झलफलायल नै; ओ अपन स्थान पर अपन पुत्रकें राजा रूप मे देखलन्हि। ओ अश्वमेध यज्ञ सफलतापूर्वक संपन्न कयलन्हि; आ एक सय दस वर्ष आ दस दिनक आयु मे अग्निक लहरि मे प्रवेश क’ अपन प्राण त्याग कयलन्हि ।
आ पुनः एक बेर: युद्धक लेल तत्पर; आलस्यक कट्टर शत्रु; वेद पाठी विद्वान सभक प्रधान; तपस्वीक वैभवसँ समृद्ध; शत्रुकेँ हाथीक समक्ष अपन पराक्रम देखेबा मे आनन्दित होय वाला—एहन छलाह राजा शूद्रक ।
आ हुनकर एही रचना मे: अवन्ती नामक नगर मे, चारुदत्त नामक एक व्यक्ति रहैत छथि, जे अपन युवावस्था आ दरिद्रता दुनू लेल विख्यात छथि; ओ एकटा ब्राह्मण व्यापारीक पुत्र छथि । हुनकर गुण मे वसन्तसेनाक अन्तःकरणकें गम्भीर प्रेमसँ आन्दोलित करबाक सामर्थ्य अछि; वसन्तसेना बसन्तक ऋतु जकाँ कान्तिमयी छथि, तइयो ओ एकटा गणिका छथि ।
तँ एतय राजा शूद्रक एही दुनू हृदयक शुद्ध प्रेमक उत्सव, विवेकपूर्ण कार्य, एकटा मुकदमक अन्याय आ घृणा, एकटा दुष्टक प्रकृति आ भाग्यक गतिक कथाकें प्रस्तुत करैत छथि ।
(ओ घूमि क’ चारू कात देखैत छथि) हमर ई सङ्गीत-शाला खाली अछि । हमरा आश्चर्य भ’ रहल अछि जे अभिनेता सभ कतय गेलाह? (सोचैत) आह, हम बुझि गेलहुँ ।
ओकर घर शून्य अछि जाहि घर मे कोनो सन्तान नै भेल; ओकर संसार तीन गुना शून्य अछि जेकर कोनो असली आ पक्का मित्र नै अछि; मूर्खक लेल ई संसार शून्य आ अनाथ अछि; मुदा दरिद्रक लेल जे किछु अछि, ओ सभ शून्य अछि ।
हम अपन अभ्यास समाप्त क’ लेलहुँ। आ हम एतेक कालसँ अभ्यास क’ रहल छी जे हमर आँखिक पुतली नाचि रहल अछि, आ भूखक मारे आँखि सुखल कमल-बीज जकां कड़कड़ा रहल अछि, जेना घामक प्रखर किरणसँ झूर-झमार भऽ गेल हो । हम आब अपन पत्नीकें बजा क’ पुछैत छियैक जे जलखै (ब्रेकफास्ट) लेल किछु अछि की नै ।
हे, हम एतय छी—मुदा नै! विशेष अवसर आ सामान्य प्रथा दुनू ई मङ्गैत अछि जे हम देशी-प्राकृत मे बाजी ।
(प्राकृत मे बाजैत) धत तेरी कऽ! हम एतेक कालसँ अभ्यास क’ रहल छी आ एतेक भूख लागल अछि जे हमर अङ्ग सभ सुखल कमल-नाल जकां कमजोर भ’ गेल अछि । हम घर जा क’ देखैत छी जे हमर नीक पत्नी किछु तैयार कऽ कऽ रखने अछि की नै ।
(ओ घूमि क’ चारू कात देखैत छथि) हम अपन घर पर छी । हम भीतर जाइत छी। (ओ प्रवेश करैत छथि आ देखैत छथि) हे भगवान! हमर घरक सभ वस्तु उलट-पुलट किएक अछि? माड़ (चाउरक पानि) क एकटा नाम धार सड़क पर बहि रहल अछि । भूमि, जतय लोहक बर्तनकें रगड़िक’ साफ कयल गेल अछि, ओ एहन सुन्दर लगैत अछि जेना कोनो कनियाँ अपन मुख पर काजरक ठोप लगेने हो । एकर सुगन्ध एतेक नीक अछि जे हमर भूख आरो प्रज्वलित भ’ क’ हमरा बेसी कष्ट द’ रहल अछि ।
की कोनो नुकायल धन भेट गेल अछि? या हम एतेक भूखल छी जे हमरा बुझाइत अछि समस्त संसार भातेसँ बनल अछि? हमर घर मे निश्चित रूपसँ जलखै नै अछि, आ हम भूखसँ मरि रहल छी। मुदा एतय सभ किछु तहस-नहस देखि रहल छी । एकटा कनियाँ उबटन तैयार क’ रहल अछि, दोसर फूलक माला बुनि रहल अछि। (सोचैत) एही सभक की अर्थ अछि? नीक, हम अपन पत्नीकें बजा क’ सत्य जनैत छी। (ओ नेपथ्य दिस देखैत छथि) आर्या, की अहाँ एक क्षणक लेल एतय आयब?
(एकटा नटीक प्रवेश होइत अछि)
नटी: हम एतय छी, स्वामी ।
सूत्रधार: अहाँक स्वागत अछि, आर्या ।
नटी: आज्ञा कयल जाय, स्वामी। हमरा की करबाक अछि?
सूत्रधार: आर्या, हम एतेक कालसँ अभ्यास क’ रहल छी आ भूखक दुआरे हमर अङ्ग सभ सुखल कमल-नाल जकां शिथिल भ’ गेल अछि । की घर मे खाय लेल किछु अछि की नै?
नटी: सभ किछु अछि, स्वामी ।
सूत्रधार: नीक, की अछि?
नटी: जेना—चीनी क संग भात, घी, दही, अन्न; आ ई सभ मिलि क’ एकटा एहन व्यञ्जन बनैत अछि जे स्वर्गक योग्य हो। देवता सभ अहाँ पर सदा एहनहि प्रसन्न रहथि!
सूत्रधार: ई सभ हमर घर मे अछि? आकि अहाँ मजाक क’ रहल छी?
नटी: (मनहि मन) हँ, हम मजाक करब। (प्रकट) ई बजारे मे अछि, स्वामी ।
सूत्रधार: (क्रोध मे) रे पापिनी, एही प्रकार तोहर अपन आशा सेहो छिन्न भ’ जाय! आ मृत्यु तोरा खोजि लिअय! किएक तँ हमर आशा, एतेक ऊपर चढ़ल छल जे ओ मात्र नीच्चां खसत ।
नटी: क्षमा करू, स्वामी, क्षमा! ई केवल एकटा परिहास छल ।
सूत्रधार: मुदा एही असाधारण तैयारीक की अर्थ अछि? एकटा कनियाँ उबटन बना रहल अछि, दोसर माला गाँथि रहल अछि, आ भूमि पांच रङ्गक यज्ञक फूलसँ सुशोभित अछि ।
नटी: ई व्रत क दिन अछि, स्वामी ।
सूत्रधार: कोनो व्रत?
नटी: एकटा सुन्दर वर पेबाक व्रत ।
सूत्रधार: एही लोक मे, आर्या, या परलोक मे?
नटी: परलोक मे, स्वामी ।
सूत्रधार: (क्रोधसँ) सज्जन वृन्द! एकरा देखू। ई अगिला जन्म मे वर पेबाक लेल हमर भोजनक बलिदान क’ रहल अछि ।
नटी: क्रुद्ध नै होउ, स्वामी। हम एही आशामे व्रत क’ रहल छी जे अहाँ अगिला जन्म मे सेहो हमर पति बनि क’ आयब।
सूत्रधार: मुदा अहाँकें एही व्रतक सुझाव के देलक?
नटी: अहाँक परम प्रिय मित्र जीर्णवृद्ध ।
सूत्रधार: (क्रोधसँ) आह, जीर्णवृद्ध, दासीपुत्र! कखन हम राजा पालककें अहाँ पर क्रुद्ध देखब? तखन अहाँ एहनहि अलग कयल जायब, जेना कोनो नव-दुलहिनक सुगन्धित केश अलग कयल जाइत अछि ।
नटी: क्रुद्ध नै होऊ, स्वामी। अगिला जन्म मे अहाँकें पेबाक लेल हम ई व्रत क’ रहल छी। (ओ हुनकर पैर पर खसि पड़ैत छथि)
सूत्रधार: उठू, आर्या, आ हमरा बताउ जे एही व्रत मे पुरोहितक काज के करताह?
नटी: अहीं सन कोनो ब्राह्मण, जेकरा हमरा सभकें निमन्त्रित करबाक अछि ।
सूत्रधार: तँ अहाँ जा सकैत छी। आ हम अपनहि सन कोनो ब्राह्मणकें आमन्त्रित करब ।
नटी: बहुत नीक, स्वामी। (ओ प्रस्थान करैत छथि)
सूत्रधार: (घूमि क’) हे भगवान! एही समृद्ध उज्जयिनी नगरी मे हम अपनहि सन कोनो ब्राह्मण कतय पायब? (ओ चारू कात देखैत छथि) आह, एतय चारुदत्तक मित्र मैत्रेय आबि रहल छथि। सुन्दर! हम हुनकासँ पुछब । मैत्रेय, अहाँकें आइ हमर घर मे पहिल निमन्त्रण स्वीकार करबाक अछि । नेपथ्यसँ आवाज: अहाँ कोनो आन ब्राह्मणकें आमन्त्रित करू। हम व्यस्त छी ।
सूत्रधार: मुदा, भाय, भोजन तैयार अछि आ ई सभ केवल अहाँक लेल अछि। एकर अतिरिक्त, अहाँकें उपहार सेहो भेटत ।
नेपथ्यसँ आवाज: हम एक बेर कहि देलहुँ। अहाँ किएक हमरा बेर-बेर विवश क’ रहल छी?
सूत्रधार: ओ मना क’ रहल छथि। नीक, हम कोनो आन ब्राह्मणकें आमन्त्रित करैत छी। (ओ प्रस्थान करैत छथि)
प्रस्तावना समाप्त
(हाथ मे एकटा अंगवस्त्र लेने मैत्रेयक प्रवेश होइत अछि)
मैत्रेय: "अहाँ कोनो आन ब्राह्मणकें आमन्त्रित करू। हम व्यस्त छी।" आ तइयो हमरा कोनो अपरिचित व्यक्तिसँ निमन्त्रणक आशा करबाक चाही । ओह, कतेक दयनीय स्थिति अछि! जखन सज्जन चारुदत्त धनी छलाह, तखन हम दिन-राति परम यत्नसँ तैयार कयल गेल सुगन्धित मधुर पकवान पेट भरि खाइत छलहुँ । हम आङ्गनक दुआरि पर बैसि क’ तरह-तरहक व्यञ्जनसँ घेरल रहैत छलहुँ, आ एकटा चित्रकार जकां जे अपन रङ्गक कृति सभकें छुबैत अछि, हम मात्र अपन आङ्गुर सभसँ ओकरा छुबि क’ अलग कऽ कऽ खाइत छलहुँ । हम नगरक बजार मे साँढ़ जकां पागुर करैत ठाढ़ रहैत छलहुँ । आ आब ओ एतेक दरिद्र भ’ गेल छथि जे हमरा एतय-ओतय आ सभ कात दौगऽ पड़ैत अछि, आ परबा जकां घर मात्र सुतबाक लेल आबय पड़ैत अछि । आब ई चमेलीक सुगन्धसँ युक्त अंगवस्त्र अछि, जेकरा चारुदत्तक प्रिय मित्र जीर्णवृद्ध हुनका लेल पठौने छथि । ओ हमरा कहने छलाह जे जखन चारुदत्त अपन पूजा-पाठ समाप्त क’ लेथिन, तखन ई हुनका द’ देबनि । तँ आब हम चारुदत्तकें खोजैत छी। (ओ चारू कात घूमि क’ देखैत छथि) चारुदत्त अपन संध्या-वन्दन समाप्त क’ लेलन्हि अछि, आ ओ गृह-देवता सभक लेल बलि (भोजनक अंश) लेने आबि रहल छथि ।
(चारुदत्त आ रदनिकाक प्रवेश होइत अछि)
चारुदत्त: (ऊपर देखि क’ आ थाकल निश्वास छोडि क’) हमर दुआरि पर, जतय बलिक अंश हँस आ सारस सभ झपटि क’ लय जाइत छल, ओतय आब घास जनमि गेल अछि, आ ई बीआ जे हम छिटैत छी, ओतय खसि रहल अछि जतय कीड़ा सभ एकर मिठासकें नष्ट क’ दैत अछि। (ओ बहुत आस्ते-आस्ते चलैत छथि आ बैसि जाइत छथि)
मैत्रेय: चारुदत्त एतय छथि। हमरा जा क’ हुनकासँ गप करबाक चाही। (लग जा क’) अहाँकें प्रणाम। अहाँक कल्याण हो ।
चारुदत्त: आह, ई हमर संगी मैत्रेय छथि। अहाँक बहुत स्वागत अछि, मित्र। कृपया बैसू ।
मैत्रेय: धन्यवाद। (ओ बैसि जाइत छथि) नीक, मित्र, ई चमेलीक सुगन्ध वला अंगवस्त्र अछि जे अहाँक मित्र जीर्णवृद्ध पठौने छथि । ओ कहने छलाह जे जखन अहाँ पूजा समाप्त क’ लेब तखन ई अहाँकें द’ दी। (ओ अंगवस्त्र अर्पण करैत छथि। चारुदत्त ओकरा लैत छथि आ विचार मे डूमि जाइत छथि) नीक, अहाँ की सोचि रहल छी?
चारुदत्त: हमर नीक मित्र, घोर अन्धकार मे चमकय वाला दीपक ओही सुखक समान अछि जे दुःखक सङ्घर्षक बाद आबैत अछि; मुदा सुखक बाद जखन मनुष्य दुःख भोगैत अछि, तखन ओकर शरीर केवल एकटा जिबैत लाशक समान भ’ जाइत अछि ।
मैत्रेय: नीक, अहाँ की चाहब, मरि जायब की आकि दरिद्र रहब?
चारुदत्त: आह, मित्र! निश्चित आ मन्द दुःखसँ नीक मृत्यु अछि; मृत्युसँ क्षणिक कष्ट समाप्त भ’ जाइत अछि, मुदा दरिद्रता कहियो नै समाप्त होय वाला दुःख आनैत अछि ।
मैत्रेय: हमर प्रिय मित्र, एहन निराश नै होऊ। अहाँक धन हुनका सभक लेल खर्च भेल अछि जिनकासँ अहाँ प्रेम करैत छी, आ चन्द्रमा जकां, जखन ओ अपन अमृत देवता सभकें द’ दैत अछि, अहाँक ई घटैत वैभव एकटा नव शोभा पाबैत अछि ।
चारुदत्त: मित्र, हम अपन नष्ट भेल धनक लेल नै कानैत छी। मुदा ई हमर दुःख अछि: जे हमरा अतिथि रूप मे प्रणाम करैत छलाह, ओ आब अनठा क’ आगू बढ़ि जाइत छथि। "ई एकटा दरिद्रक घर अछि," ओ कहैत छथि। जेना ऋतु समाप्त भेला पर मधुमाछी सभ ओही हाथीक भण्डारक छत्ताकें छोड़ि दैत अछि, जेकर मद समाप्त भ’ गेल हो ।
मैत्रेय: ओह, धत तोरी कऽ ओइ धनकें! ई कोनो सोचबाक योग्य वस्तु नै अछि । ई वन मे ओही चरवाहाक छौड़ा जकां अछि जे बिढ़नी सँ डराइत अछि; ई बिढ़नी ओतय नै बिलमैत अछि जतय एकरा भोजनक लेल उपयोग कयल जाइत अछि ।
चारुदत्त: विश्वास करू, मित्र। हमर दुःख केवल सुवर्णक ह्राससँ नै अछि; किएक तँ लक्ष्मी चंचल अछि, ओकर कृपा स्थिर नै रहैत अछि; मुदा जकर पूर्व धन नष्ट भ’ गेल हो, ओकर हृदयक मित्र सेहो शीतल आ उदासीन भ’ जाइत अछि। आ दरिद्र मनुष्य लज्जित होइत रहैत अछि; लज्जासँ ओकर प्रतिष्ठा आ यश नष्ट भ’ जाइत अछि; यशक अभावसँ अपमान सहय पड़ैत अछि; अपमानसँ ग्लानि आ ग्लानिसँ विषाद उत्पन्न होइत अछि; विषादसँ मूर्खता आ मूर्खताक फल मृत्यु अछि—आह! धनक अभावहि समस्त पापक जड़ि अछि!
मैत्रेय: मुदा केवल ई याद राखू जे धन कतेक तुच्छ वस्तु अछि, आ प्रसन्न होऊ ।
चारुदत्त: मित्र, मनुष्यक दरिद्रता ओकरा लेल चिन्ताक घर अछि, एकटा एहन लज्जा अछि जे मन मे रहैत अछि, मानव जातिक संग एकटा आन प्रकारक युद्ध अछि; अपन मित्रक घृणा अछि, अपरिचित सभसँ द्वेष अछि, आ ओही स्त्रीसँ सेहो अपमान अछि जे कहियो प्रेम करैत छलीह; मुदा जदि ओकर पत्नी ओकरा तुच्छ बुझय, तखन कोनो सुनसान वन मे आश्रय खोजनाइये उचित अछि। ओकर आत्माकें तड़पावय वाला दुःखक ई ज्वाला उग्र रूपसँ जरैत अछि, तइयो ओकरा जिबैत छोड़ि दैत अछि । मित्र, हम गृह-देवता सभकें अपन बलि अर्पित क’ देलहुँ अछि । अहाँ जा क’ चौबटियापर मातृ-देवी सभकें पूजा अर्पित करू ।
मैत्रेय: नै!
चारुदत्त: किएक नै?
मैत्रेय: किएक तँ देवता अहाँ पर प्रसन्न नै छथि, एतेक आदर भेला पर सेहो। तँ पूजा कयलासँ की लाभ?
चारुदत्त: एहन नै मित्र, एहन नै! ई एकटा गृहस्थक नित्य कर्तव्य अछि । देवता सभ सदा ओही पुरुष सभक दान, तप, चिन्तन आ प्रार्थनासँ प्रसन्न रहैत छथि जे सांसारिक चिन्तासँ मुक्त छथि। तखन अहाँ किएक सङ्कोच क’ रहल छी? जाउ आ मातृ-देवी सभक लेल बलि अर्पण करू।
मैत्रेय: नै, हम नै जा रहल छी। अहाँ कोनो आन व्यक्ति कें पठाउ । ओहिनो, हमरा संग सभ किछु विपरीत भ’ रहल अछि, हम एकटा दरिद्र ब्राह्मण जे छी! ई दर्पण मे प्रतिबिम्ब जकां अछि; दक्षिण भाग वाम भ’ जाइत अछि, आ वाम भाग दक्षिण भ’ जाइत अछि । एकर अतिरिक्त, संध्याक एही समय मे, राजाक राजपथ पर सभ प्रकारक लोक घूमि रहल छथि—गणिका, विट, नौकर आ राजाक प्रिय पात्र। ओ सभ हमरा सहज शिकार बुझताह, जेना कोनो करिया साँप बेंगक शिकार करैत काल अपन रस्ता मे मूषककें जकड़ि लैत अछि । मुदा अहाँ एतय बैसि क’ की करब?
चारुदत्त: नीक तखन, अहाँ एतहि रहू; आ हम अपन पूजा समाप्त करैत छी ।
नेपथ्यसँ आवाज: रुकू, वसन्तसेना, रुकू! (विट, संस्थानक आ नौकर द्वारा पछोड़ कयल जाइत वसन्तसेनाक प्रवेश होइत अछि)
विट: वसन्तसेना! रुकू, रुकू! आह, भय अहाँक कोमलताकें किएक रूपान्तरित क’ रहल अछि? अहाँक सुकुमार चरण सभकें एतेक कष्ट किएक भ’ रहल अछि, जे नृत्य मे कतेक सुन्दरतासँ थिरकैत छल? अहाँक आँखि, भयसँ त्रस्त भ’ क’, एना किए टेढ़ भऽ देखैत अछि? शिकारी सभसँ भागय वाला भयभीत हरिणक जकां अहाँ किएक भागि रहल छी?
संस्थानक: रुकू वसन्तसेना, रुकू! किएक भागैत छी? आ दौगैत छी? आ घुरैकाल ठेस खाइत छी ? दयालु बनू! अहाँ नै मरब । ओह, अपन पैर रोकू! प्रेमक मारे, सुकुमार कनियाँ, हमर व्याकुल हृदय जरि रहल अछि, जेना कोइलाक ढेरी पर मौसक टुकड़ा।
नौकर: रुकू, गणिका, रुकू! भयसँ अहाँ भागि रहल छी, हमरासँ दूर, जेना गरमीक ऋतु मे मोरनी भागैत अछि; मुदा हमर स्वामी आ मालिक तीव्र गतिसँ चलि रहल छथि, जेना वन मे वनमुर्गा ।
विट: वसन्तसेना! रुकू, रुकू! अहाँ किएक थरथरा रहल छी, किएक भागि रहल छी, केराक गाछ जकां कम्पायमान भ’ क’? अहाँक वस्त्रक किनार, लाल आ सुन्दर, हवा मे डोलि रहल अछि; कखनो-कखनो, कमलक कली भूमि पर खसि रहल अछि, जेना खूनक बुन्द हो। अहाँ एकटा लाल डरीड़ जकां लगैत छी, जाहिसँ चोट लगला पर लाल रङ्गक धार बहैत अछि ।
संस्थानक: रुकू, वसन्तसेना, रुकू! अहाँ हमर वासना, हमर इच्छा, हमर प्रेमकें जगा देलहुँ अछि; अहाँ राति मे बिछौन पर हमर नीद उड़ा देलहुँ अछि; भय आ त्रास दुनू अहाँक हृदयकें आन्दोलित क’ रहल अछि; अहाँ अपन तीव्र उड़ान मे लड़खड़ा क’ खसि रहल छी। मुदा सूर्य आ कुन्ती सन अपन इच्छासँ हम सेहो अहाँक पूर्ण भोग करब।
विट: आह, वसन्तसेना, अहाँक ई तीव्र गति हमर दौगैत पैर सभसँ आगू किएक निकसि रहल अछि? गरुड़क पराक्रमक समक्ष भयभीत साँप जकां अहाँ किएक भागि रहल छी, हमर प्रिय? की हम हवाक झोंककें ओकर उड़ान मे नै पकड़ि सकैत छी? तइयो हम अहाँकें नै पकड़ब, यद्यपि हम पकड़ि सकैत छी ।
संस्थानक: हमर बात सुनू, स्वामी! ई कामदेवक कोड़ा, ई नचनियाँ, मछली खाय वाली, अपन कुलक नाशक, ई हठी, मदक पेटार, गणिका , ई कपड़ा सुखावयवाला रस्सी, चंचल प्राणी, पापिनी कनियाँ—हम ओकरा दसटा सुन्दर नाम देलहुँ, तइयो ओ हमर इच्छाक समक्ष नै झुकल।
विट: जेना विटक आङ्गुर सभ वीणाक तार पर चोट करैत अछि, ओनाहिते नृत्य करय वाला कानक कुण्डल अहाँक कपोल पर चोट क’ रहल अछि । अहाँ भयसँ व्याकुल भ’ क’ किएक भागि रहल छी, जेना मेघक गर्जन भेला पर सारस पक्षी भागैत अछि?
संस्थानक: अहाँक झङ्कार करय वाला आभूषण सभ कतेक बजैत अछि; द्रौपदी जकां अहाँ भागि रहल छी, जखन अर्जुन हुनकर चुम्बन कयलन्हि ।
नौकर: ओ राजाक प्रिय पात्र छथि; ओ जे कहथि ओकर पालन करू। आ अहाँकें खाय लेल नीक माँछ आ मांस भेटत। किएक तँ जखन कुकुर सभकें समस्त माँछ आ मांस भेट जाइत अछि जे ओ चाहैत छथि, तखन हुनका लेल मृत मांस मधुर नै लगैत छनि ।
विट: आर्या वसन्तसेना, अहाँक नितम्ब पर नीचां लटकय वाला करघनी एहन चमकैत अछि जेना आकाशमे तारा सभ; अहाँक भागबाक ई अद्भुत भय अहाँक सुन्दरताकें नष्ट क’ रहल अछि।
संस्थानक: हम अहाँक पछोर अपन पूर्ण शक्तिसँ क’ रहल छी, जेना कुकुर सभ गिदरक पीछा करैत अछि, मुदा अहाँ अपन उड़ान मे बहुत चतुर आ चंचल छी, आ हमर हृदयकें जड़ि समेत चोरा क’ लय जाइत छी ।
वसन्तसेना: पल्लवक! प्रभृतिका!
संस्थानक: स्वामी! एकटा पुरुष! एकटा पुरुष!
विट: कायर नै बनू ।
वसन्तसेना: माधविका! माधविका!
विट: (हँसैत) मूर्ख! ओ अपन दासी सभकें बजा रहल अछि ।
संस्थानक: स्वामी! की ओ एकटा स्त्रीकें बजा रहल अछि?
विट: हँ, निश्चित रूपसँ ।
संस्थानक: स्त्री! हम सैकड़ामे लोककेँ मारि दैत छी। हम एकटा वीर पुरुष छी ।
वसन्तसेना: (कोनो उत्तर नै सुनैत) हाइ, कोन कसरि भ’ गेल जे हमर अपन सेवक सभ सेहो हमरा छोड़ि देलन्हि? हमरा अपन बुद्धिसँ अपन रक्षा करबाक चाही ।
विट: खोज बन्द नै करू ।
संस्थानक: चिकड़ू, वसन्तसेना, अपन कोकिल प्रभृतिका लेल, या अपन फूल आ पल्लवक लेल या समस्त वैशाखक मास लेल! अहाँकें के बचेबाक लेल आबयवाला अछि जखन हम अहाँक पीछा क’ रहल छी? भीमसेन क बात किएक करू? या जमदग्निक पुत्र, ओही शक्तिशाली महापुरुष क? या दसमुख रावणक? या कुन्तीक पुत्रक? केवल हमरा देखू! हम अपन आङ्गुर अहाँक केश मे फसा क’, दुःशासन जकां, ओकरा घीचब । देखू, देखू! हमर तलवार तेज अछि; प्रणाम। अहाँक मुड़ी! एकरा काटि क’ अलग क’ दइ छी, या अहाँकें मारि दैत छी । तखन हमर क्रोधसँ बचबाक यत्न नै करू; जखन अहाँकें मरबाक अछि, तँ अहाँक जीवन समाप्त अछि ।
वसन्तसेना: महाभाग, हम एकटा दुर्बल स्त्री छी ।
विट: एही लेल अहाँ अखन धरि जीवित छी ।
संस्थानक: एही लेल अहाँक हत्या नै भेल अछि ।
वसन्तसेना: (मनहि मन) ओह! हुनकर ई शिष्टाचारहि हमरा भयभीत क’ रहल अछि। आउ, हम एकर यत्न करैत छी। (प्रकट) महाभाग, अहाँ की आशा राखैत छी? हमर आभूषण?
विट: भगवान नै करथि! आर्या वसन्तसेना, एकटा उपवनक लताकें ओकर फूल सभसँ विमुख नै करबाक चाही। आभूषणक विषय मे पुनः किछु नै कहू ।
वसन्तसेना: तखन अहाँक की इच्छा अछि?
संस्थानक: हम एकटा पुरुष छी, एकटा पैघ पुरुष, एकटा साक्षात वासुदेव । अहाँकें हमरासँ प्रेम करबाक चाही ।
वसन्तसेना: (क्रोधसँ) हे भगवान! अहाँ हमरा थका देलहुँ। हमरा छोड़ू! अहाँक शब्द एकटा अपमान अछि ।
संस्थानक: (हँसैत आ ताली बजबैत) देखू, स्वामी, देखू! गणिकाक बेटी हमरा पर कतेक अनुराग देखा रहल अछि, नै? एतय ओ कहैत अछि- आउ! हे भगवान, अहाँ थाकि गेल छी। नै, हम कोनो आन गाम या आन नगर चलि क’ नै आबि रहल छी । नै, छोटकी मालकिन, हम महाभागक मूड़ीक किरिया खाइत छी, हम अपन पैरक किरिया खाइत छी! अहाँक पैरक पाछां दौड़ैत-दौड़ैत हम थाकि गेल छी आ क्लान्त भ’ गेल छी ।
विट: (मनहि मन) की! की ई सम्भव अछि जे ई मूर्ख नै बुझैत अछि जखन ओ कहैत अछि "अहाँ हमरा थका देलहुँ"? (प्रकट) वसन्तसेना, अहाँक शब्दक गणिकाक घर मे कोनो स्थान नै अछि, जेना अहाँ जनैत छी, प्रत्येक युवकक मित्र होइत अछि; मोन राखू, अहाँ ओही फूलक समान सझिया सम्पैत छी जे मार्गक कात मे उगैत अछि; कटु सत्य ई अछि जे अहाँक शरीरक अपन मूल्य अछि; अहाँक सुन्दरताक वैभव ओकर अछि जे बजारक वर्तमान दर चुकाबैत अछि। तखन ओही पुरुष क सेवा करू जेकरासँ अहाँ प्रेम करैत छी, आ ओकरो जेकरासँ अहाँ घृणा करैत छी । आ पुनः: श्रेष्ठ ब्राह्मण आ नीच मूर्ख दुनू एकहि पोखरि मे स्नान करैत छथि; मयूरक समक्ष सेहो फूलक गाछ झुकैत अछि, आ कौआ क समक्ष सेहो; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य सभ साधारण जनताक संग यात्रा करैत छथि। अहाँ वएह पोखरि छी, वएह फूलक गाछ छी, वएह नाव छी; आ अहाँक सुन्दरता पर प्रत्येक मनुष्यक अधिकार अछि ।
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